Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन
- Mohit Sharma (Trendy Baba / Trendster)

Wednesday, February 22, 2017

स्लीपर क्लास पत्नी, फर्स्ट ए.सी. पति (कहानी)


कुंठा अगर लंबे समय तक मन में रहे तो एक विकार बन जाती है। कुंठित व्यक्ति यूँ ही गढ़ी बातों को बिना कारण विकराल रूप दे डालता है। कुछ ऐसा ही हाल विकल को अपने मित्र और बिज़नस पार्टनर चरणप्रीत का लग रहा था। एक बार व्यापार से जुड़े मामले में दोनों मित्र कार से दूसरे शहर जा रहे थे। सफर 6-7 घंटे का था और एक-डेढ़ घंटो में ही दोनों कार के स्टीरियो में पड़ी एकमात्र सीडी के गानो से ऊब गए थे। चरणप्रीत ने रेडियो ट्यून करने की कोशिश की पर बड़ी खरखराहट के साथ आ रही आवाज़ सुनकर उसने रेडियो बंद कर दिया। फिर समय काटने के लिए और जगे रहने के लिए विकल और चरणप्रीत बातें करने लगे। वैसे समय तो दोपहर का था पर चरणप्रीत को इतनी लंबी ड्राइविंग की आदत नहीं थी। 

एक बात से दूसरी बात निकली और चरणप्रीत के घर की बात होने लगी। विकल ने कुछ हिम्मत जुटा कर कहा। 
"भाई! बुरा मत मानना पर भाभी को लेकर तेरी एक आदत नोट की है।"

चरणप्रीत चौंका कि आखिर उसके जीवन की ऐसी कौनसी बात दिख गई विकल को, उत्सुकतावश तुरंत ही वह बोल पड़ा -
"पहले बात बता फिर सोचूंगा कि उसपर बुरा मानना है या नहीं...अरे मज़ाक कर रहा हूँ! तू तो अपना याडी है, तेरी बात का बुरा मानूँगा तो फिर हो लिया काम।"

विकल - "मैंने देखा है तू भाभी के साथ पराया सा बर्ताव करता है। जैसे खुद तू पर्सनल ट्रिप, बिज़नस ट्रिप में प्लेन से जाता है पर पिछले महीने और उस से पहले भी मैंने देखा कि तूने भाभी को ट्रेन में मुम्बई से उनके घर मैनपुरी भेजा। अपने जन्मदिन पर ऑफिस के चपरासी तक को तूने होटल में पार्टी दी थी और अपने घर तू किशन चाइनीज कार्नर से सस्ता खाना पैक करवाकर ले गया था। ये तो वो कुछ बातें जो मुझे याद आ रहीं है ऐसे छोटा-मोटा कुछ न कुछ दिखता है तेरा..."

चरणप्रीत ने गहरी सांस ली और बोला। "थैंक यू भाई, मुझे लगा यह बोझ हमेशा दिल में ही रह जाएगा। अच्छा लगा तूने इतना ध्यान दिया। कभी कोई सीरियल, एड या किताब में देखना अरेंज मैरिज केवल लड़कियों की समस्या की तरह दिखाई जाती है...जैसे हम लड़को को तो सब मनमुताबिक मिल जाता है, कोई समझौता नहीं करना पड़ता। जब मेरी शादी हुई तब मैं तैयार नहीं था पर घरवालो को समझाना मुश्किल हो रहा था। मैं कुछ समय और बिना ज़िम्मेदारी के पढ़ना चाहता था, कुछ बेहतर करना चाहता था पर किसी को मेरी बात समझ नहीं आयी? तो मेरी औकात के हिसाब से शादी हो गई। जैसे मान ले मैं तब रेलवे का 'स्लीपर क्लास' डब्बा था और मेरी औकात के अनुसार एक 'स्लीपर क्लास' टाइप लड़की से मेरी शादी हुई। समय के साथ धूप में खाल जलाकर, धुएं से धुँधले हुए शहर में अपने फेफड़े ख़राब कर, बीमारियां पालकर मैंने बिज़नस बनाया और आज मैं स्लीपर क्लास की औकात से ऊपर आकर 'फर्स्ट क्लास ए.सी.' डब्बा बन गया पर मेरी पत्नी तो स्लीपर क्लास ही रही ना, जब उसने स्लीपर का टिकेट लेकर मुझसे शादी की तो उसे किसलिए मैं फर्स्ट ए.सी. में सफर कराऊँ?"

विकल - "हाँ तेरे साथ गलत हुआ। लाइफ इज नॉट फेयर, पर यार जीवन में कदम-कदम पर हर किसी के साथ गलत होता है। तू समाज का बदला अपनी जीवनसंगिनी से क्यों ले रहा है? भाभी तो बेचारी कभी शिकायत नहीं करती, नहीं तो कोई और होती तो तू शायद चैन से सो तक नहीं पाता। यह कोई खेल थोड़े ही है कि जीवन में तेरे विरुद्ध कुछ पॉइंट्स हुए तो तू अपनी शर्तो पर जीवन से बदला लेकर उसके विरुद्ध पॉइंट्स बनाएगा। अपनों को बेवजह दुश्मन मत बना, कुंठा के पर्दे हटाकर एक बार उनकी आँखों का समर्पण, प्रेम देखना वो तुझसे शादी करते समय भी फर्स्ट ए.सी. था और अब भी!"

विकल की बातों से चरणप्रीत की आँखें नम होने को थी इसलिए उसने बहाने से अपना मुँह फेर लिया।

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Thursday, February 16, 2017

छूटी डोर (कहानी)


हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य के बहुत बड़े समीक्षक-आलोचक, अनुवादक श्री अनूप चौबे का टी.वी. साक्षात्कार चल रहा था। साक्षात्कारकर्ता अनूप के पुराने मित्र नकुल प्रसाद थे। कुछ सवालो बाद नकुल को एक बात याद आ गई और अपने साथ लाये सवालो के बीच उन्होंने एक सवाल रखा। 

"आपने पहले कई बार अपना उपन्यास, कथा/काव्य संग्रह लिखने की मंशा मुझसे साझा की थी। उस बारे में कुछ बताएं?"

हालाँकि, यह इंटरव्यू लाइव नहीं था पर चौबे जी असहज हो गए। कुछ संभलने के बाद उन्होंने फिर बोलना शुरू किया। 

"वर्षो तक एक के बाद एक ना जाने कितनी कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पास से देखा। कई बार तो किसी रचना के लेखक, कवि से अधिक उस रचना के साथ समय बिताया। दूसरो के गढ़े काल्पनिक जगत में गलतियां, कमियां निकालने का जूनून पता नहीं कब आदत में बदल गया। एक समीक्षक की तरह लिखना या अनुवाद करना अलग है पर जब भी लेखक की तरह कुछ लिखता हूँ तो मेरी यह आदत किसी मीनिया की तरह मेरा पीछा करती है। अपनी कल्पना के कुछ वाक्य पूरे करते ही मन उनपर अपना नकारात्मक फरमान सुना देता है। अपना लिखा मेरी नज़र से कभी पास हो ही नहीं पाता है जो किसी और तक पहुँच पाये। कभी-कभी तो रात में उठकर पिछले दिन लिखे पन्ने फाड़े हैं ताकि चैन से सो सकूँ।"

नकुल प्रसाद - "ओह! क्षमा चाहता हूँ! मुझे यह स्थिति पता नहीं थी। आप चिंता मत कीजिये, मैं वो सवाल और आपकी प्रतिक्रिया एडिट करवा दूंगा।"

अनूप चौबे - "कोई बात नहीं...अगर मैंने यह क्षेत्र ना चुना होता तो शायद मैं अच्छा साहित्य लिख पाता क्योकि सच कहूँ तो रचना की अपूर्णता, उसकी कमियां ही उसका साज-श्रृंगार हैं। ऐसी बातें ही रचना की एक अलग छाप बनाती हैं। आपने देखा होगा कैसे कोई अपने चेहरे की कमी बताता है और उसकी वही चीज़ जिसे वह कमी मानता है अक्सर लोगो को पसंद आती है। सबसे बड़ी रचनाकार प्रकृति जो हमे मरते दम तक अपनी कलाकृतियों से विस्मित करती है, में पूर्णता से दूर अनगिनत छूटी डोर हैं। साहित्य में सामाजिक दायरे की फ्रीक्वेंसी पर सेट दिमागी पैमाने को संतुष्ट करना असंभव है। चलिए कोई बात नहीं, यह जन्म इस रोल में ही सही..."

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Wednesday, February 8, 2017

रिया के मम्मी-पापा (डार्क कहानी)


*कमज़ोर दिल के लोग यह कहानी न पढ़ें।*

रिया की मम्मी - "मैं और मेरे पति सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं...कम से कम बाहर से कोई मिले या देखता होगा, वह तो यही कहेगा। कुछ महीने पहले हमारी एकलौती बेटी रिया ने आत्महत्या कर ली। उसका वज़न सामान्य से अधिक था, बस इतनी सी बात थी। भला यह भी कोई बात हुई? काश एक बार मुझसे या अपने पिता से अपना जी बाँट लेती। समाज की यही तो रीत है - हर चीज़ में सामान्य होने की एक सीमा/रेंज है। जैसे शादी इतने साल से इतने साल तक हुई तो ठीक इसके बाहर तो बर्बाद, इतना शरीर सामान्य, इसके ऊपर या नीचे बर्बाद, इतनी पढाई ठीक....इसके नीचे बर्बाद! अब हम बड़े तो एकबार सुनकर फिर अपने-अपने काम में लग जाते हैं पर बेचारे बच्चे कहाँ तक समझे और कितना सहें? उनके जीवन में ध्यान बँटाने वाली ज़िम्मेदारियां नहीं होती ना!

बच्ची की कमी न महसूस हो इसलिए रिया के पापा उसके साथ की तीन और बच्चियाँ उठा लाये। आखिर बाप का दिल है, मैं भी क्या समझाती इन्हें? ये 3 वही लड़कियां हैं जो रिया के मोटापे का मज़ाक बनाती रहती थी। इतना कोमल मन था मेरी बच्ची का, किसी का दर्द नहीं देख पाती थी पर जाने कितने महीने अपना दर्द अनदेखा कर छुपाती रही। उसे लगा होगा कि कभी न कभी ये लड़कियां उसके व्यक्तित्व को सराहेंगी, पेंटिंग, डांस, गायन जैसे उसके हुनर शायद उसको सबकी खासकर इन तीनो की "सामान्य रेंज" में ले आएं। ओह! मैं ज़रा खाना देख आऊं, अंदर तीनो बच्ची लोग भूखी होंगी बाकी आगे रिया के पापा बताएंगे।"

रिया के पापा - "आप कहोगे क्या दरिंदे हो गए हैं हम पति-पत्नी? इन लड़कियों को क्यों प्रताड़ित कर रहे हैं? अरे किसी चीज़ की कमी नहीं है इन्हें यहाँ। अच्छे कपडे, किताबें, टी.वी. और खाना! मोटापा कम करने के लिए लाइपोसक्शन नाम का एक ऑपरेशन होता है। इस ऑपरेशन में व्यक्ति के शरीर से अतिरिक्त वसा (फैट) निकाला जाता है। रिया 18 साल की होती और एक बार कहती तो तुरंत उसका यह ऑपरेशन करवा देता पर अभी उसमे 2 साल थे। फिर भी मैंने शहर के 2 ऐसे अस्पतालों के चपरासियों से सेटिंग कर ली है। उन दोनों से मुझे हर हफ्ते शहर में कुछ लोगो के लाइपोसक्शन से निकला 25-30 किलो फैट मिल जाता है। उसी को कच्चा या उसके पकवान बना कर इन्हें बड़े प्यार से खिलाते हैं हम दोनों। बताओ कोई अपने बच्चो के लिए भी करेगा इतना? लो बन गया खाना। इन्हें रिया की चौथी फ्रेंड के बारे में नहीं बताया?"

रिया की मम्मी - "अरे हाँ! तीन नहीं चार थी ये ग्रुप में। तभी हफ्ते का इतना फैट कम पड़ जाता था। वो तो अच्छा हुआ इनमे से एक स्टोर रूम से भागने की कोशिश में रिया के पापा के हाथ आ गई। फिर मैंने और इन्होंने उस लड़की को फैट के कनस्तर में डाला....फिल्मो, सीरियलों में जैसे दलदल में डूबते दिखाते हैं लोगो को वैसे धीरे-धीरे डूबी वो लड़की। ठीक ही हुआ! वो लड़की ही सबसे ज़्यादा चींचां और उल्टियाँ करती थी बाकी तीन तो शांत हैं बेचारी। ये सब छोडो आप अपनी सुनाओ? इस बार खाना खाये बिना नहीं जाने देंगे आपको..."

समाप्त!

- मोहित शर्मा ज़हन

Read: अमीर की हाय (कहानी)
Listen: Dimaag ki Faltu Random Lyrics Storage (Mohit Trendster)

Saturday, January 21, 2017

जुग जुग मरो #1 - मुआवज़ा (काव्य कॉमिक)


जुग जुग मरो सीरीज की पहली कविता और कॉमिक्स के संगम से बनी काव्य कॉमिक्स, "मुआवज़ा" शराबियों और सरकार पर कटाक्ष है, जो अपने-अपने नशे में चूर पड़े रहते हैं और जब तक उन्हें होश आता है तब कुछ किया नहीं जा सकता। अपना मन बहलाने के लिए कड़े कदम और राहत की मोक ड्रिल की जाते है और फिर सब पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं। मुश्किल सामने पड़ी चुनौतियाँ नहीं बल्कि उनसे निपटने की नियत रखने में है। समाज का एक तबका इतना व्यर्थ माना जाता है कि 10 जाएं या हज़ार मजाल है जो समाज ठिठक तक जाए। 


चित्रांकन - अभिलाष पांडा 
काव्य, पटकथा - मोहित शर्मा ज़हन 
रंग - हरेन्द्र सैनी, ज्योति सिंह 
शब्दांकन - युद्धवीर सिंह
कवर - कादिर नाकिप्लर

Saturday, December 17, 2016

दुश्मन मेहमान (कहानी)


वर्ष 1978
ब्रिटिश साम्राज्य से आज़ादी मिलने के बाद बने क्रोनेशिया और सर्बा पडोसी मुल्कों के बीच रिश्ते हमेशा तल्ख़ रहे। दशकों तक शीत युद्ध की स्थिति में दोनों देशो का एक बार भीषण युद्ध हो चुका था। अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद युद्ध समाप्त हुआ। युद्ध में कुछ टापू और समुद्री सीमा कब्ज़ाने वाले सर्बा को जीत मिली थी पर दोनों तरफ भारी नुक्सान हुआ था। युद्ध के बाद स्थिति काफी बदल गयी थी। अब क्रोनेशिया एक अच्छे-खासे रक्षा बजट के साथ आर्थिक रूप से सशक्त राष्ट्र था।

रिक स्मिथ नामक न्यूक्लियर साइंटिस्ट का नाम अक्सर किस्से-कहानियों में आता था। लोग कहते थे कि वह कोई किवदंती, क्रोनेशिया का काल्पनिक सिंबल है पर सर्बा की ख़ुफ़िया एजेंसी जानती थी कि रिक जो कई नाम और पहचानो से जाना जाता था सिर्फ वैज्ञानिक ना होकर एक काबिल सीक्रेट एजेंट भी था। उसने सर्बा के कुछ महत्वपूर्ण मिशन, व्यापारिक डील्स को नाकाम किया था और वह सर्बा व अन्य देशो की सहायक ख़ुफ़िया एजेंसियों के कई एजेंट्स की हत्या कर चुका था। सर्बा के दर्जनों जासूस सिर्फ उसको पकड़ने या मारने के लिए वर्षो से प्रयासरत थे।

सर्बा के टॉप एजेंट चीमा को रिक के नेपाल में देखे जाने की सूचना मिलती है। चीमा तुरंत अपने दल के साथ नेपाल रवाना होता है। तटस्थदेश में छद्म पहचानो के साथ गुप्त रूप से ही काम किया जा सकता था इसलिए चीमा की गतिविधियां सीमित और लक्ष्य पर केंद्रित थी। रिक के वहाँ होने का कारण ढूंढ रहा चीमा नेपाल की सीमाओं पर अपने सहायक नियुक्त करता है। क्या रिक ने किसी डील के लिए नेपाल आने का जोखिम लिया था या फिर वह कोई डील तोड़ने आया था? नेपाल में सर्बा दूतावास हर उपलब्ध जानकारी चीमा को दे रहा था। इन दस्तावेजों को देखते हुए चीमा का ध्यान एक कागज़ पर गया जहाँ कुछ सर्बाई लोगो के नाम थे। यह दल नेपाल की तरफ से माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाला था। दल के सदस्यों में देश के कुछ प्रमुख वैज्ञानिक थे। चीमा ने स्थानीय शेरपा से एवरेस्ट के बारे में जानकारी ली। शेरपा ने बताया की कई बार एवरेस्ट पर चढ़ते हुए लोग फिसल कर ऊंचाई से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं, अचानक हिमस्खलन में दब जाते हैं या शून्य से दर्जनों डिग्री नीचे तापमान को झेलते हुए 8000 मीटर से ऊपर "डेथ ज़ोन" में ऑक्सीजन की कमी के कारण चेतना, मानसिक संतुलन खोकर मारे जाते हैं। अक्षम, घायल या मरते हुए लोगो को नीचे लाने में जान का जोखिम होता है इसलिए इस पर्वत पर 250 से अधिक मृत पर्वतारोहियों के शरीर जस के तस पड़े हैं जिनमे हर साल कुछ लाशों का इज़ाफ़ा होता है। चीमा को उसकी शंकाओं का समाधान मिल गया था। बदली पहचान के साथ रिक इस दल को एवरेस्ट की ऊंचाई पर ख़त्म करने वाला था। बिना वक़्त बेकार कर चीमा अपनी टीम के साथ एवरेस्ट चढ़ाई पर निकल पड़ा। उसका पहला लक्ष्य था सर्बाई वैज्ञानिको को बचाना था और उस से भी महत्वपूर्ण रिक को मारना था। टीम को भरोसा था कि चढ़ते या उतरते हुए कभी न कभी तो रिक उनके हाथ लगेगा। कहीं रिक चीन की तरफ से न उतरे इसलिए चीमा ने एक अन्य दल को चीन की तरफ की चढाई की घेराबंदी पर लगाया। चेताने के लिए सर्बा दल को रेडियो संदेश भेजे गए जिनका जवाब नहीं आया। अपनी टीम और गाइड शेरपा को पछाड़ता चीमा रिकॉर्ड समय में 25000 फ़ीट तक पहुँच गया, एवरेस्ट के आखरी "कैंप 4" से उसे एक हेलीकॉप्टर उड़ता दिखाई दिया। इस ऊंचाई से ऊपर हवा की परत इतनी पतली थी की हेलीकॉप्टर सुरक्षित उड़ या उतर नहीं सकता था, नीचे जाते उस हेलीकॉप्टर में चीमा को रिक की एक झलक दिखी। चीमा  जान गया था कि अब कोई वैज्ञानिक ज़िंदा नहीं होगा, कुछ मीटर चढ़ाई के बाद उसके अंदाज़े की पुष्टि वैज्ञानिको के निर्जीव शरीर देख कर हो गयी। अधूरी तैयारी की अपनी भूल पर गुस्से से फुफकारता चीमा दुनिया के शिखर, एवरेस्ट की छोटी से सिर्फ 250 मीटर से नीचे लौट आया।

वर्ष 1980
सर्बाई नौसेना, वासुसेना की घेराबंदी से क्रोनेशिया की तीनो सेनाओं की गतिविधियां सीमित हो गयी थी। चीमा को एक से अधिक इंटेल मिली कि 8 महीनो से क्रोनेशिया से बाहर मौजूद रिक को हर हाल में क्रोनेशिया लौटना था। बाहरी देशो द्वारा बहिष्कार करने के बाद देश के 2 नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र और परमाणु हथियारों बनाने का पूरा ज़िम्मा रिक और उसकी टीम पर आ गया था। चीमा के मार्गदर्शन में सर्बा की भारी घेराबंदी की वजह से रिक द्वारा क्रोनेशिया में घुसने की 2 कोशिशें नाकाम हो चुकी थी। क्रोनेशिया का तीन तरफ से सर्बा से घिरा होना रिक की परेशानी की सबसे बड़ी वजह थी। केवल समुद्र के रास्ते ही रिक अपने देश में जा सकता था, जिसके आस-पास सर्बाई नौसेना और एजेंट्स का जाल बिछा था।

2 यात्री विमान सर्बा के समुद्री क्षेत्र के ऊपर उड़ते हैं जिनको ट्रेस कर तुरंत सर्बाई लड़ाकू विमान भेजे जाते हैं। इन यात्री विमानों से संपर्क करने पर कोई जवाब नहीं आता। लड़ाकू विमान द्वारा चेतावनी के अन्य तरीके भी विफल हो जाते हैं। अचानक अंदर हुए धमाकों के साथ क्षतिग्रस्त विमान क्रैश होने लगते हैं। दोनों विमान समुद्र में क्रैश ना होकर सर्बा शासित दो टापुओं पर गिरते हैं। इन टापुओं पर सर्बा के 2 महत्वपूर्ण परमाणु संयंत्र थे जिनके कोर के पास गिरकर विमानों ने भारी तबाही मचाई। इन टापुओ और आस-पास के समुद्री क्षेत्र में विकिरण फ़ैल गया, जिस वजह से सर्बा को इन्हें क्वारंटाइन घोषित करना पड़ा। लड़ाकू विमान पायलट्स ने आँखों देखा हाल बताया पर क्रोनेशियाई सरकार और मीडिया ने खबर फैलाई कि किस तरह मासूम पर्यटकों से भरे विमानों को सर्बा वायुसेना द्वारा मार गिराया गया। टापू पर पड़े और समुद्र में तैरते मानव अवशेष इस बात की पुष्टि कर रहे थे। विदेशी मीडिया को मृत पर्यटको की तस्वीरें, लिस्ट बांटी गयी, उनके नाम पर स्मारक बनाये गए और मानवीय आधार पर सर्बा की विश्वभर में कड़ी निंदा हुई। इस घटना से सर्बा को दोहरा नुक्सान हुआ था उसके परमाणु संयंत्र तबाह हुए जिनसे फैले विकिरण के कारणउसको टापुओ पर से हटना पड़ा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी होने के साथ कुछ प्रतिबंध भी लग गए। नुक्सान का जायज़ालेता और टापुओं पर से सामान समेटता चीमा जानता था कि इतने बड़े षडयंत्र के पीछे सिर्फ रिक हो सकता है। बाद में मानव अंशो की जांच और अपने सूत्रों से उसके पता चला कि दोनों यात्री विमानों के दोनों पायलट आत्मघाती मिशन पर थे और बड़ी चालाकी से उन्होंने अपने आपको दो टापुओं के संयंत्रो पर क्रैश किया। विमान के अंदर मौजूद यात्री पहले से ही मृत लोग थे, जिन्हें अलग-अलग मुर्दाघरों से लाया गया था और काल्पनिक पहचान दी गयी थी। चीमा का दिमाग घूम रहा था। वह उलझन में था कि क्या वह रिक की किसी और चाल को नाकाम करने का इंतज़ार करे या अपने तरीके से इन हमलो का जवाब दे। बार-बार के रक्षात्मक रवैये से चीमा परेशान हो चुका था। उसने ठाना कि जब रिक लोगो की जान, सही-गलत की परवाह नहीं करता तो उसे भी देशहित के लिए इतना नहीं सोचना चाहिए। अब उसने क्रोनेशिया को रिक के अंदाज़ में ही नुक्सान पहुंचाने के लिए कुछ योजनाएं बनानी शुरू की, जो काफी लंबे समय से उसकी रक्षात्मक योजनाओ के बिल्कुल उलट थीं। चीमा ने अपने नेटवर्क के ज़रिये क्रोनेशिया को भारी कीमत पर दोयम दर्जे की रक्षा पनडुब्बियां दिलवायी। कुछ समय बाद उसने क्रोनेशिया की एक छावनी में स्थित झील को विषाक्त कर दिया। क्रोनेशियाई सरकार और एजेंट्स सतर्क हो गए थे इसलिए कुछ समय के लिए सर्बा सरकार ने उसे फिर से रिक संबंधी टीम की ज़िम्मेदारी सौंप दी। चीमा दोबारा उस रक्षात्मक एजेंट पिंजरे में आ गया था जिससे वह नफरत करता था। अपने हर मिशन में जान लड़ाने के बाद भी चीमा की एक नज़र हमेशा पुराने दुश्मन रिक की ख़बरों पर बनी थी। वह जानता था कि अब तक रिक को क्रोनेशिया घुसने में सफलता नहीं मिल पाई है। चीमा यह किस्सा हमेशा के लिए ख़त्म कर देना चाहता था ताकि फिर कभी उसे इस भूमिका में ना बंधना पड़े। क्रोनेशिया सम्बंधित 2 छोटे पर सफल मिशन अंजाम देने के बाद चीमा का आत्मविश्वास बढ़ गया था। इस काम के लिए उसने अपनी टीम में 2 दर्जन जूनियर एजेंट्स जोड़ लिए थे। सर्बाई खेमे को सूचना मिली कि चीमा की सतर्कता से रिक महीनों से क्रोनेशिया में घुस नहीं पा रहा है, ऐसे में चीमा की जान को खतरा है।

कुछ दिनों बाद तड़के सर्बा सुरक्षा राडारों पर चमकते एक बिंदु ने हड़कंप मचादिया। एक विशालकाय अज्ञात कार्गो विमान सर्बा की समुद्री सीमा के ऊपर उड़ रहा था जो कुछ ही देर में सर्बा में प्रवेश करने वाला था। पहले की तरह विमान को भेजे गए सभी संदेशो का कोई जवाब नहीं आया। चीमा समुद्री युद्ध पोत पर अपनी टीम के साथ सारे घटनाक्रम पर नज़र रखे था। एक फाइटर प्लेन कार्गो विमान को चेताने पहुंचा। चीमा के अनुसार सर्बा की सतर्कता के चलते क्रोनेशिया दोबारा विमान इच्छित स्थान पर क्रैश करने वाली हरकत नहीं कर सकता था, उसे मामला कुछ और ही लग रहा था। इस बार सर्बाई फाइटर प्लेन पहले से आधुनिक और कार्गो प्लेन को हवा में ही निष्क्रिय करने में सक्षम था। लड़ाकू विमान पायलट ने जब पास से कार्गो विमान के कॉकपिट को देखा तो उसमे दो मृत या बेहोश पायलट पड़े थे और कुछ महिलाएं मदद के लिए हाथ हिलाती दिख रही थी। पायलट ने उन्हें रेडियो गियर पहनने का इशारा किया। रेडियो पर महिलाओं ने बताया की कॉकपिट में हवा का दबाव कम होने के कारण दोनों पायलट बेहोश हो गए हैं, जिस वजह से विमान एक दिशा में उड़ा जा रहा है। फाइटर पायलट और ग्राउंड कण्ट्रोल ने उन महिलाओं को विमान को हवा में रखने के सीमित निर्देश दिए जो वो समझ सकें। सब सुनने के बाद चीमा का शक बना हुआ था, सर्बाई नौसेना अलर्ट पर थी। आखिरकार महिलाएं एक पायलट को होश में लाने में सफल रही लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कार्गो विमान का ईंधन ख़त्म हो चूका था और विमान को समुद्र में क्रैश लैंडिंग करनी पड़ी। विमान पानी को छूते ही टुकड़ो में बिखर गया। लगभग 70 महिलाएं पैराशूट पहन कर पहले ही विमान के पिछले द्वार से कूद चुकी थी। चीमा को लग रहा था कि विमान में जैविक हथियार हो सकते हैं जो सर्बा के समुद्री क्षेत्र में तबाही मचा सकते हैं। विमान सर्बा के आखरी टापू बेस और क्रोनेशिया की समुद्री सीमा से कुछ मील दूर ही क्रैश हुआ था। चीमा ने युद्ध पोत के बजाए अन्य छोटे माध्यमो से जाने का फैसला लिया। जोखिम लेते हुए उसने कुछ स्टीमर और बड़ी नावों से मलबे और पानी में तैर रही महिलाओं को घेरा और बंदी बनाकर टापू के सैन्य बेस पर ले आया। सभी महिलाओं की तलाशी ली गयी। इतनी बड़ी घटना में रिक का हाथ हो सकता था जिस वजह से चीमा ने अपनी महिला सैनिको से ख़ास इस बात की पुष्टि करवाई कि क्या ये सभी महिलाएं ही हैं या इनमे कोई पुरुष, किन्नर भी छुपा है, सब महिलाएं थी। अब बारी थी गहन पूछताछ की, जिसके लिए अगर कड़ा टॉर्चर ज़रूरी हो तो उसके निर्देश थे। आश्चर्यजनक रूप से बंदी महिलाएं थोड़ी प्रताड़ना में ही बोलने लगी। उन्होंने बताया कि वह क्रोनेशिया की कॉलेज कैडेट्स हैं जो एक सहायक देश तोरमा में नर्सिंग की ट्रेनिंग ले कर लौट रही थी। पहले उनका विमान अंतरराष्ट्रीय मार्ग से उड़ रहा था पर अचानक कॉकपिट में दबाव कम होने से पायलट बेहोश हो गए और विमान सर्बा की सीमा में चला गया। चीमा के पास बैठे मनोवैज्ञानिको, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों का यही मत था कि ये महिलाएं सैनिक या एजेंट नहीं थी। इन दलीलों का चीमा पर कोई असर नहीं पड़ रहा था और वह एक-एक कर सभी महिलाओं से पूछताछ करने लगा। घंटो बाद कोई निष्कर्ष ना निकलने पर चीमा को ऊपर से आदेश आया कि महिलाओं की संख्या अधिक है इसलिए उन्हें छोड़ दिया जाए। सर्बा फिर से अंतरराष्ट्रीय बहिष्कार, किरकिरी नहीं चाहता था।  चीमा ने बातों में अनियमितता, उलझन दिखा रहीं 11 महिलाओं को रोककर बाकी को जाने दिया। हालांकि, इन महिलाओं को वह अब 48 घंटो से अधिक नहीं रोक सकता था पर उसे विश्वास था कि वह किसी ना किसी लीड तक ज़रूर पहुंचेगा।

चीमा और उसके दल ने इन महिलाओं को और प्रताड़ना दी। चीमा के दिमाग में एक उलझन खटक रही थी कि कोई ऐसी बात है जो उसके दिमाग में नहीं आ रही है।  कुछ तो छूट रहा है। आखिरकार कुछ कैडेट्स ने क्रोनेशिया से जुड़े कुछ नक़्शे, ख़ुफ़िया जानकारी दी। 48 घंटे पूरे होने के बाद बेजान सी हो चुकी कैडेट्स को क्रोनेशिया तटरक्षक नौका को सौंप दिया गया। नौका के आँखों से ओझल होते हुए चीमा विडियोगेम खेलने लगा, कुछ देर बाद उसके अवचेतन मस्तिष्क की एक छोटी सी जानकारी ने उसे झटका दिया। क्रोनेशिया में तो ऐसी कोई कैडेट ट्रेनिंग नहीं होती, ना ही वहां की किसी सेना में महिलाएं हैं। चीमा का दिमाग घूम गया, वह कुछ स्टीमर्स के साथ नौका के पीछे गया। अब दौड़ अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा से क्रोनेशियाई सीमा तक जाने की थी। अगर क्रोनेशिया तटरक्षक नाव अपनी सीमा में पहुँच जायेगी तो उसपर हमला करना समुद्री जंग छेड़ सकता था। जिसका डर था वही हुआ, वह नाव अपने देश के तट से कुछ ही दूर थी। निराश चीमा को लौट जाना पड़ा। उसे याद आया कि वह क्या चीज़ थी जो उसका दिमाग पकड़ नहीं पा रहा था। एक औरत का चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था...बिलकुल रिक जैसा। जब अपने क्रोनेशिया में घुसने की कई कोशिशें नाकाम हो गयी तो देश सेवा के लिए रिक और उसकी टीम ने सेक्स चेंज ऑपरेशन और हॉर्मोन थेरेपी की मदद से अपना लिंग बदल लिया था। अब वो सब वाकई में महिला बन गए थे। यह कार्गो विमान का सारा ड्रामा रिक स्मिथ और उसकी टीम ने अपने देश में घुसने के लिए रचा था। मुस्कुराता हुआ चीमा मन ही मन अपने सबसे बड़े दुश्मन की तारीफ़ कर रहा था पर उसने अभी हार नहीं मानी थी, चीमा के  मन में बदला लेने की भावना और प्रबल हो गयी थी।
============
- मोहित शर्मा ज़हन

Friday, December 9, 2016

Book: Apne-Apne Kshitij (Lagukatha Sankalan)

4 stories in the anthology, Book Launch: 8 January, 2017 - World Book Fair Delhi :)

अपने-अपने क्षितिज - लघुकथा संकलन (वनिका पब्लिकेशन्स)
56 लघुकथाकारों की चार-्चार लघुकथाओं का संकलन।
मुखावरण - चित्रकार कुंवर रविंद्र जी

विश्व पुस्तक मेले में 8 जनवरी 2017 को 11:30 बजे वनिका पब्लिकेशन्स के स्टैंड पर इस पुस्तक का विमोचन का कार्यक्रम है व, जिसमें आप सभी आमंत्रित हैं।

Sunday, December 4, 2016

कद्र (काव्य कॉमिक #12) #Freelance_Talents


Kadr (Kavya Comic Series)

Deepjoy Subba (Illustrator), Mohit Sharma (Writer-Poet), Harendra Saini (Colorist), Youdhveer Singh (Letterer), Cover Artist – James Boswell

Intro Poem (2016), Comic Poem (2007), Cover Art (1939)
====================


बेटा जब बड़े हो जाओगे....
बेटा जब बड़े हो जाओगे ना...
...और कभी अपना प्रयास निरर्थक लगें, 
तो मुरझाये पत्तो की रेखाओं से चटख रंग का महत्त्व मांग लेना। 
जब जीवन कुछ सरल लगे,
तो बरसात की तैयारी में मगन कीड़ो से चिंता जान लेना।

बेटा जब बड़े हो जाओगे ना...
...और कभी दुख का पहाड़ टूट पड़े,
तो कड़ी धूप में कूकती कोयल में उम्मीद सुन लेना। 
जब सामने कोई बड़ी चुनौती मिले,
तो युद्ध में घायल सैनिक से साँसों की कीमत जांच लेना।

बेटा जब बड़े हो जाओगे ना...
...और कभी अहंकार का दंश चुभे,
तो सागर का एक छोर नाप लेना। 
जब कहीं विश्वास डिगने लगे,
तो कुत्ते की आँखों से वफादारी नेक लेना। 
कभी दुनिया का मोल पता ना चले,
गुरु की चिता पर बिलखते शिष्य में कद्र सीख लेना।

बेटा जब मेरी याद आये...
...तो अपने बच्चे को छाँव देती किसी भी माँ में मुझे देख लेना।

========================

कद्र (काव्य कॉमिक) अब Culture POPcorn वेबसाइट, Google Books-Play, Archives, Issuu, Ebooks Daily, Comicverse आदि पर उपलब्ध। 

Saturday, November 19, 2016

Insaani Pari - Peripheral Angel Comic (Freelance Talents)


Tribute Comic 
This short biographical Hindi comic is based on the true life story of Neerja Bhanot (7 September, 1963-5 September, 1986), a flight purser with Pan Am Airlines. She worked as a model, and later as a flight purser, but her private life was far from glamorous. She had an early arranged marriage, which was marred by spousal abuse with frequent demands for dowry and even forced starvation. Fed up with the constant mental and physical abuse, she left her husband. Later on, she applied for a job as flight purser at Pan Am. She got selected, trained, and took the job.  

On 5 Sep, 1986, the ill-fated Pan Am Flight 73, on which she was on board staff, was hijacked by terrorists affiliated with Abu Nidal Organisation, in Karachi, where it landed. The terrorists asked the flight staff to collect the passports of the passengers on board so that they could identify the Americans whom they intended to kill. Neerja managed to hide the passports of 41 Americans on board, and thus saved their lives. A few hours later, when the terrorists got tired with the whole operation, they decided to kill everyone on the plane. Neerja succeeded in slipping off a few passengers and the pilots through the emergency exit, while she herself died of bullet wounds whilst trying to save some children. She deliberately chose not to escape, even when she had her chance, just so that she could save others. She was only 22 when she died. She received India’s highest civilian gallantry award, Ashok Chakra, Tamgha -eInsaniyat, from Pakistan and Special Courage Award (United States Department of Justice) posthumously. Her murderers were captured and sentenced, some of whom succeeded in escaping.  

This comic does not focus on the aftermath of her death in the hijacking event. It only tries to depict the inspirational story of Neerja as a graphic narrative, in particular her struggles, and the events which happened during the hijacking incident. 
Page 3

Available (Online read or download):
ReadwhereScribdAuthor StreamISSUUFreeleaseSlideshare, Archives, Fliiby, Google Books, Play store, Daily Hunt, Smashwords, Pothi and Ebook Library etc.

Illustrator – Tadam Gyadu (PencilDude) 
Author – Mohit Sharma (Trendster) 
Colorist – Harendra Saini 
Cover Colorist – Dheeraj Dkboss Kumar 
Calligrapher – Youdhveer Singh 

Tuesday, October 18, 2016

समय का उधार (कहानी) - मोहित शर्मा ज़हन


पणजी स्थित निजी पर्यटन कंपनी में सेल्स मैनेजर आनंद कुमार एक अरसे बाद कुछ दिनों की छुट्टियों पर अपने घर अलीगढ आया था। पहले कभी कॉलेज हॉस्टल से छुट्टियों में घर लौटकर जो हफ़्तों की बेफिक्री रहती थी वो इस अवकाश में नहीं थी। रास्ते में ही आनंद को काम में कुछ अधूरे प्रोजेक्ट्स की बेचैनी सता रही थी। माँ, पिता और छोटी बहन से मिलकर कुछ देर के लिए आनंद को सुकून मिला। 

माँ देखते ही शिकायत करने लगी कि "रंग कितना गिर गया है, चेहरे पर निशान हो गए हैं। अपना बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखता ये लड़का!" 

घर अब पहले सा क्यों नहीं लग रहा? आनंद के मन में उथल-पुथल चल रही थी.... पहले मुझे अगले दिन तक की फ़िक्र नहीं रहती थी, आज इतनी चिंता क्यों है? माँ-बाप जो कभी खाली बैठना पसंद नहीं करते थे अब उम्र के असर से धीरे-धीरे चलते है और उन्हें बीमारी, जोड़ों के दर्द को सहते हुए काम करते देखकर तकलीफ होती है। माँ किचन में खाना बनाते हुए अपनी खांसी नहीं रोक पा रही थी, लंगड़ाते हुए जब वों खाना लेकर आयीं तो आनंद बड़ी मुश्किल से अपनी पीड़ा छुपा पाया। वह माँ जो उसे गोद में लेकर घंटो तक पार्क, मेलों में घुमा लाती थी, जिसका बीमार होना घर में किसी को कभी पता नहीं चलता था। आज उनमे मेरे प्रति उतना ही स्नेह था पर उनका शरीर साथ नहीं दे रहा था। अपनी सर्विस में 12-15 घंटे की शिफ्ट करने वाले पिता जी का स्वास्थ्य अब अक्सर ख़राब रहता। पढाई के साथ-साथ बहन को घर का काम करना पड़ता। घरवालो की इस हालात को देखकर मुझे खुद पर शर्म आई। कुछ समय पहले तक मैं सोच रहा था कि मेरे लगभग सभी दोस्तों की शादी हो गयी है और मैं 30 साल का हो चूका हूँ, मुझे भी पणजी में अपनी गृहस्थी बसानी चाहिए। अब घर की स्थिति देखकर लगता है कुछ पैसे और जोड़कर 3-4 साल बाद शादी करनी चाहिए। 

आनंद शहर में रह रहे अपने बचपन के स्कूली मित्रों के हाल-चाल लेने निकला। 5-6 मित्र जब साथ मिले तो लगा ही नहीं कि इतना समय अंतराल हुआ है, वही पुरानी बेफिक्री और हँसी-ठहाको का माहौल लौट आया। नुक्कड़ की गुमटी पर चाय के दौर में सबने अपने बीते वर्षों के किस्से बांटे। काफी समय बाद आनंद के माथे पर जो शिकन हमेशा बनी रहती थी, वो कुछ देर के लिए मिट गयी। फिर किसी दोस्त ने कहा - "सुना अंशु मैम गुज़र गयीं।" सभी चुप हो गए, उन्हें याद आया कि हरदम शैतानी करने वाले वो बच्चे कैसे अंशु मैम की क्लास में भोले, मासूम बन कर बैठ जाते थे। जो किसी विषय में ढंग से पढाई नहीं करते थे, काम पूरा नहीं करते थे, वो अंशु मैम के विषय सोशल स्टडीज़ में बाकी क्लास से बेहतर करते थे। मैम को क्या पसंद है, मैम का घर कहाँ है, घर में कितने लोग हैं, मैम का रूटीन क्या है आदि जैसी कई बातें आनंद और उसके गुट को रटी हुई थी। अंशु मैम उनका पहला क्रश थी, जिनके प्रति वो सब आकर्षित तो थे साथ ही सब उनका बहुत आदर करते थे। मैम को इम्प्रेस करने में आनंद सबसे अव्वल था। क्या क्लासवर्क, क्या होमवर्क वह तो कोर्स से बाहर की बातें तक याद करता था कि कहीं मैम के सामने स्टाइल मारने में काम आ जाएं। गुट का नेता होने के नाते बाकी मित्र थोड़ा दबे रहते थे। फिर सबको कहीं से खबर मिली कि अंशु मैम की शादी होने वाली है। मित्रों में मातम सा छा गया, काश मैम 10-12 साल इंतज़ार कर लेती हमारे सेटल होने तक, वैसे ये अपेक्षा तो सबको पता थी कि वास्तविक नहीं थी लेकिन मैम की शादी दूसरे शहर में हो रही थी यानी सबके मन में उनके स्कूल को छोड़कर जाने का दुख अधिक था। अंशु मैम की शादी का दिन आया और सभी मित्र घर पर कोई ना कोई बहाना बनाकर, 21  किलोमीटर साइकिल चला कर शहर के दूसरे छोर पर स्थित विवाह स्थल फार्महाउस पर पहुंचे। वहाँ स्कूल का कोई बच्चा नहीं आया था बल्कि इक्का-दुक्का ही शिक्षक पहुंचे थे। दुल्हन बनी अंशु मैम बहुत सुन्दर लग रहीं थी। उन्हें देखकर सबके चेहरे खिल गए। आनंद एंड पार्टी का शाम को इतनी दूर तक साइकिल चला कर आना जैसे सफल रहा। मैम बच्चो को देखकर चौंक गयीं, उन्होंने सबको अपने पास बुलाया। पूछने पर आनंद ने बताया की सब उसके दोस्त के बड़े भैया की कार में आएं हैं। मैम ने सबको धन्यवाद दिया और कहा कि "क्लास में सबको न्योता तो मैंने यूँ ही दे दिया था। मुझे लगा कोई बच्चा तो वैसे भी नहीं आने वाला, तुम सब आये मुझे बहुत अच्छा लगा। शाम को ज़्यादा देर तक मत रुकना और अच्छे से खाना खाकर जाना। बच्चो ने मैम को गुलदस्ता दिया और ऐसे कोने में चले गए जहाँ से मैम उन्हें देख या टोक ना सकें। इतनी मेहनत करने के बाद सबको तेज़ भूख लगी थी, खाने की तरफ बढ़ते उनके कदम स्टेज पर आते दूल्हे को देखकर रुक गए। आनंद गुट को दूल्हे का चेहरा देखकर जैसे सांप सूंघ गया। सबके भोले मन में एक बात थी कि हमारी परी जैसे मैडम का वर इतना मोटा-थुलथुल, बदसूरत कैसे हो सकता है? और तो और ऐसे व्यक्ति से शादी करने को मैम राजी कैसे हुई? मैम इतनी खुश कैसे हो सकती हैं? ज़रूर मैडम की ज़बरदस्ती शादी की जा रही है। इस मार्मिक आघात के बाद मित्र मण्डली की भूख मर गयी। नम आँखें लिए सब लोग अपने घर को चले, जितनी तेज़ी से विवाह स्थल पर आने को वो लोग पैडल मार रहे थे, अब वापसी में साइकिल चलाना उतना ही भारी हो गया था। दूल्हे और उसके खानदान को भला-बुरा सुनाते हुए सबने किसी तरह रास्ता काटा। आज 16-17 वर्षों बाद अंशु मैडम की मौत की खबर ने वो साड़ी यादें ताज़ा कर दी। 

मित्रों में अपनी कहानी साझा करने की बारी आनंद की थी। उसने दोस्तों को याद दिलाया कि कैसे किशोरावस्था में वो सब आनंद के शरीर और चेहरे की वजह से उसको मॉडलिंग में जाने की सलाह देते थे पर वह पढाई में व्यस्त हो गया। स्कूल वाले आनंद से काफी सयाने हो चुके इस आनंद के लिए सब जानने वाले आश्वस्त थे कि वह कहीं अच्छी जगह जाएगा। मित्रों के साथ उसने पढाई शुरू की, समय के साथ बहुत कम लोग अपने इच्छित क्षेत्र में सफल हुए, कुछ लोगो ने अपने अभिभावकों की सम्पत्ति से दूकान या कोई व्यवसाय शुरू किया और कुछ तैयारी में लगे रहे। उसके कई प्रयासों बाद जब वह कोई सरकारी नौकरी पाने में सफल नहीं हुआ तो उसने कुछ जगह नौकरी का आवेदन दिया। ऐसा नहीं था कि आनंद में दिमाग या लगन की कमी थी पर भारत जैसे विशाल देश में आवेदको की इतनी भीड़ थी कि हर बार वह लिखित या साक्षात्कार में ज़रा से अंतर से रह जाता और यह सिर्फ आनंद की कहानी नहीं थी, उसके जैसे लाखो लोग इन दशमलव अंको से जीवन की दौड़ हार रहे थे। 

आखिरकार एक सिलाई मशीन और मिक्सी की कंपनी में उसे सेल्समैन की नौकरी मिल गयी। कभी ऐसी नौकरियों पर वह हँसता था और कमिश्नर, बैंक पीओ बनने के सपने देखता था। मशीन बेचने जाते हुए वह हमेशा यह प्रार्थना करता कि कहीं कोई जान-पहचान वाला ना देख ले और उसकी बेइज़्ज़ती ना हो जाए।   जब उसने यह काम शुरू किया तब आनंद के मन में फील्ड वर्क करने वाले लोगो के लिए उसके मन में सम्मान बढ़ा। जीवन के बहुमूल्य वर्ष वह तैयारी में निकाल चुका था इसलिए वह अपनी नौकरी पूरी लगन से करने लगा। जो माँ का दुलारा हुआ  था और धूप में बाहर निकलने में नखरे किया करता था वह अब मौसम की परवाह किये बिना अपने सेल्स टारगेट को पूरा करने में लगा रहता था। काम से उसकी त्वचा काली और धब्बेदार हो गयी, अनियमित खान-पान से उसका शरीर बेडोल हो गया। कुछ वर्ष पहले जिसे मॉडल बनने के सुझाव मिलते थे, अब कोई पुराना मित्र उसे देख कर पहचान नहीं सकता था। खैर मेहनत रंग लायी और उसे पणजी में अच्छे वेतन और बेहतर पद पर नौकरी मिल गयी। अब आनंद का लक्ष्य पैसे जुटाकर घरवालो का संघर्ष कुछ कम करना था। पणजी में काम करते हुए उसे 4-5 वर्ष हो चुके थे। उसकी कहानी सुन एक मित्र ने दिलासा दिया कि आनंद अकेला नहीं है देश की भीड़ में हर दूसरा व्यक्ति ऐसा ही संघर्ष करने को मजबूर है।

अपनी छुट्टी यादों में गोते लगाते हुए पूरी करने के बाद आनंद पूरे जोश के साथ नौकरी में जुट गया। उसकी मेहनत के सब कायल हो गए, 5 वर्षो में वह सीनियर मैनेजर, जोनल मैनेजर के पद से दक्षिण भारत में उस कंपनी का डिप्टी हेड बन गया। अब उसकी मासिक आय लाखों में हो गयी। माँ-बाप के लिए एक नया घर खरीदने और छोटी बहन की शादी करने के बाद 35 वर्ष की आयु में उसने शादी करने का मन बनाया। किस्मत से उसकी शादी एक सुशील व सुन्दर लड़की मधु से हुई, जिसने आनंद का संघर्ष देखा था और इसी वजह से वह आनंद की बहुत इज़्ज़त करती थी। 

विवाह दिवस आया और आनंद स्टेज पर आया। ख़ुशी के अवसर पर परिवार के चेहरे खिले हुए थे, माता-पिता अपने बच्चे की मेहनत और तरक्की से खुश थे। उसकी मित्र मण्डली जश्न में डूबी थी, उनका हीरो, उनका लीडर आज घोड़ी चढ़ रहा था। फिर मेहमानों की भीड़ में आनंद की नज़र कई अनजान चेहरों पर पड़ी। कुछ लोगो की आँखों में अविश्वास था, तो कुछ उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। मधु भी एक शिक्षिका थी और आखिरकार मधु के कुछ छात्र भी शादी में आये। सबकी प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी 21-22 साल पहले अंशु मैम की शादी में उनके दूल्हे को देख कर आनंद और उसके मित्रों की थी। हर किसी की नज़रें जैसे कह रहीं हो कि परियों सी मधु मैडम का पति इतना मोटा, दाग-धब्बेदार, बदसूरत कैसे हो सकता है और मधु मैम इस शादी से इतनी खुश क्यों हैं? किसी को भी सालों तक बाहर भागने से धूप में जली आनंद की खाल, काम की जल्दी में हुई दुर्घटना से हुए निशान, समय की ठोकरो एवम व्यस्तता के चलते अनियमित खाने-पीने से बिगड़े-बेडोल शरीर, आँखों पर चश्मे की हकीकत नहीं पता थी। ना ही किसी ने पता करने की ज़हमत उठायी। नम आँखों के साथ आज आनंद (और उसके दोस्त) अन्य लोगो की नज़रों में अपने पुराने रूप को देख रहा था और अंशु मैम से माफ़ी मांग रहा था कि "मैडम! आपने गलत निर्णय नहीं लिया था, आपने सही इंसान को अपना जीवनसाथी चुना था।"

समाप्त!

=================

Artworks - Ihor Pasternak