Freelance Falcon ~ Weird Jhola-Chhap thing ~ ज़हन

उम्मीद है
कि यहाँ (शायद) आप असली मोहित से मिल पायेंगें. :)


- Mohit Sharma (Trendy Baba / Trendster)

Tuesday, September 20, 2016

Comic - 3 Run ka Sauda (Freelance Talents)


Comic 3 Run ka Sauda now available on Culture Popcorn, Dailyhunt, Google Play-Books, Readhwere, Comics Our Passion, Ebooks Now, Smashwords, Author Stream, Pothi and many other ebook websites. 

CulPop intro - "3 रन का सौदा - भारतीय क्रिकेट में राजनीति और पैसे के खेल से बर्बाद हुए अनेक कैरियर्स की दास्ताँ। सुनहरी दुनिया की रौनक के पीछे के मटमैले धब्बो को दर्शाती अमित अल्बर्ट की कला और मोहित शर्मा की लेखनी से सुसज्जित एक यादगार कॉमिक।"

Comic Advert

Artist: Amit Albert
Writer-Editor: Mohit Sharma
Colorist: Harendra Saini
Letterer: Youdhveer Singh

Saturday, August 13, 2016

New Book - ज़हनजोरी (Zahanjori) [ISBN: 9781618133922]


Namastey! :) I am happy to inform you about my new book (story collection) ज़हनजोरी (Zahanjori). It’s preorder is now available on BooksCamel. Follow this link: www.bookscamel.com/preorders/zahanjori 
More deals, discounts and Amazon.com, Flipkart, Door Deals, Instamojo, Google weblinks soon.
53 stories and poems, Paperback: 152 pages, Hindi
ISBN: 9781618133922

Tuesday, July 26, 2016

किन्नर माँ (कहानी)


बिल्लो के घर के बाहर उसके साथी किन्नरों का समूह जमा था। बिल्लो के बाहर निकलते ही सबने उसे घेर लिया, भावुक सरोज दल का नेतृत्व कर रहा था।

सरोज - "तू रूमी को क्यों पढ़ा रही है? तुझे उसकी माँ बनने का शौक चढ़ा है?"

बिल्लो - "रूमी बहुत होशियार है। ग्रैजुएशन कर लिया है, अभी पुलिस अफसर का एग्जाम निकाल देगी देखना!"

सरोज - "नशा किया है तूने? शादी का सीजन है, काम पे लगा इसको!"

बिल्लो - "क्यों तुझे चिढ मच रही है कि उसको नाचने-गाने के अलावा कुछ करने को मिल रहा है?"

सरोज रुँधे गले से बोला - "तुझे पता है रूमी फिजिकल टेस्ट में औरत नहीं निकलेगी...सबका बराबर हक़ बस कहने की बात है, हम जैसों को देखते ही निकाल देते हैं कोई न कोई बहाना बनाकर।"

बिल्लो - "तुझे पता है मैं साड़ी की जगह सलवार सूट क्यों पहनने लगी?"

बिल्लो ने अपना सूट ऊपर उठाया, जहाँ किडनी ऑपरेशन से बना बड़ा निशान था।

बिल्लो - "अपना पैसा लगाकर और तब भी पूरा नहीं पड़ा तो किडनी बेच कर रूमी का सेक्स चेंज ऑपरेशन करवाया है। डॉक्टर ने कहा माँ नहीं बन सकती पर मेडिकल में ये औरत ही आएगी। इसे अपने नरक से निकालने की मेरे पास यही एक तरकीब थी।"

रोता हुआ सरोज बिल्लो के गले लग गया। नम आँखें लिए पूरे दल के चेहरे पर एक सवाल था..."क्यों?"
"कभी मैं भी रूमी की तरह होशियार थी। मदद के लिए बहुत भागी, गिड़गिड़ाई पर किसी ने मेरे 'हिजड़े' की पहचान से आगे कुछ जानना ही नहीं चाहा।"

समाप्त!
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- मोहित शर्मा ज़हन

Monday, July 25, 2016

मवाली भूत (कहानी)

गिरधारी बाबा ऊपरी संकट, भूत-प्रेत-चुड़ैल भगाने में पारंगत थे। एक सुनसान रात बाबा भारी ज्वर से पीड़ित अपने आश्रम के बाहर पड़े होते हैं और कई भूत, चुड़ैल और प्रेत उन्हें घेर लेते हैं। बुखार मे तप रहे बाबा कराहते हुए कहते हैं - "चीटिंग! अब इस हालत में बदला लोगे तुम लोग?"

भूत दल के मुखिया - "ओहोहोहो...देखो बहुरानी आदर्श-उसूलों की बात कर रहीं हैं! तब ये बातें कहाँ होती हैं जब हमारा ध्यान बँटाकर हमे झाड़ू-चिमटे पेले जाते हैं? भगवान की आड़ लेकर मंत्र फूंके जाते हैं? हमारा भी तब ऐसा ही हाल होता है। खैर, हम बदला-वदला लेने नहीं आये हैं, हफ्ता लेने आये हैं।"

गिरधारी बाबा - "हफ्ता?"

मुखिया भूत - "हाँ! हमारे नाम पर इतना पैसा कमाते हो, तुम और तुम्हारे शिष्य ऐश से रहते हैं। कुछ हमारा भी बनता है ना?"

गिरधारी बाबा - "वो सब तो ठीक है पर तुम लोग पैसों का क्या करोगे? छी-छी-छी मर गए पर लालच नहीं गया..."

यह बात सुनकर भूतों ने गुस्से में गिरधारी बाबा को खाट से गिरा दिया और अच्छे से धूल-कीचड में मेरिनेट किया। 

मुखिया भूत - "आया मज़ा या और करें...वो पैसा हमे अपने जीवित सगे-संबंधियों, मित्रों की मदद के लिए चाहिए। जिन्हें बहुत ज़रुरत है सिर्फ उनतक पैसा पहुंचाना होगा। तुम्हारे यहाँ जो नए पीड़ित आएंगे उनपर लगी आत्माओं से निपटने में हम मदद करेंगे।"

गिरधारी बाबा - "अगर मैं ना कर दूँ तो..."

मुखिया भूत - "अबे! कोई अंगारों पे थोड़े ही नचवा रहें है तुझे। ज़रा सा हफ्ता ही तो मांगा है। मना करोगे तो हम तुम्हारे काम में निरंतर विघ्न-बाधा डालते रहेंगे। एक हफ्ते मे जो 25-30 केस निपटाते हो वो 5-7 रह जाएंगे। तुम्हारी ही इनकम और गुडविल कम होगी...सोच लो?"

समाप्त!
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- मोहित शर्मा ज़हन

Wednesday, July 13, 2016

अच्छा घोटाला (कहानी)


प्रोजीट के राष्ट्र प्रमुख फिलांद्रे के सुरक्षा सलाहकार रॉनी अपने सुरक्षाकर्मियों से तेज़ दौड़ते हुए राष्ट्र प्रमुख के पास पहुंचे, जो पहले ही इमरजेंसी मीटिंग में थे। 

रॉनी - "चीफ! हमें उन जंगलों में बचावकर्मी भेजने होंगे।"

फिलांद्रे - "तुम जानते हो रॉनी इस तूफ़ान से हुई न्यूक्लियर संयंत्र दुर्घटना के बाद उस जंगल का 60-70 किलोमीटर का क्षेत्र विकिरण के प्रभाव में आ गया है। वहाँ  7-8 कबीलों को बचाने में करोडो डॉलर्स का खर्च होगा, इस से बेहतर तो यह होगा कि हमें उस क्षेत्र को सील कर क्वारंटाइन घोषित कर दें।"

रॉनी - "...लेकिन चीफ मुझे यह खबर मिली है कि न्यूक्लियर एक्सीडेंट के समय आपके छोटे भाई और बहन जंगल सफारी पर थे। वहाँ पोस्टेड लोगो ने बताया कि  तूफ़ान के बाद उनका दल भटक गया, दल द्वारा मदद के लिए एक मैसेज भेजा गया था पर वो लोग लोकेट नहीं हो सके...हो सकता है वो दोनों और उनकी टीम अब किसी कबीले के साथ भटक रही हो। ये कबीले संयंत्र से दूर जंगल के अन्य छोर के पास हैं तो अभी भी उम्मीद है कि उन तक जानलेवा विकिरण का प्रभाव कम हुआ हो।"

करोडो की ऐसी-तैसी कर फिलांद्रे ने पूरी फ़ौज लगा दी और एक-एक कर सारे कबीले बचा लिए, कबीलों के लोगों पर विकिरण का गंभीर असर नहीं हुआ था। फिलांद्रे चिंतित था कि किसी कबीले के पास उसके भाई, बहन की खबर नहीं थी। बचाव अभियान का नेतृत्व कर रहे रॉनी का भी आखरी कबीले के बचाव के बाद से कोई अता-पता नहीं था। फिर फिलांद्रे को रॉनी का एक पत्र मिला जिसमे उसके भाई-बहन की टीम का पता था। रॉनी ने उन्हें टीम सहित किडनैप करवाया था ताकि उनकी आड़ में वो सभी कबीलों को बचा सके। देश का सुरक्षा सलाहकार होने के कारण उसके काम और राष्ट्र प्रमुख को दी गयी जानकारी पर किसी ने शक नहीं जताया। अब रॉनी किसी अंजान देश फरार हो चुका था।  

मुस्कुराते हुए फिलांद्रे ने सभी कबीलों के इलाज और अन्य जंगली क्षेत्र में उनके पुनर्वास का आदेश दिया। 

समाप्त!
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- मोहित शर्मा ज़हन

Sunday, July 10, 2016

जागते रहो! (हॉरर कहानी)

नील को पता था कि उसे सीवियर स्लीप पैरालिसिस की समस्या थी। इस विकार में कभी-कभी नींद खुलने पर उसका दिमाग कई मिनट जगा रहता था और अपने आस-पास की चीज़ें महसूस करता था पर वह अपनी मर्ज़ी से अपना शरीर नहीं हिला पाता था। ऊपर से सोने पर सुहागा ये कि ऐसी अवस्था में अक्सर उसे भ्रम की स्थिति होती थी। भ्रम और डर में उसे लगता था कि कटे चेहरे वाली बच्ची उसकी छाती पर बैठी अपने नाखूनों से आड़ी-तिरछी रेखाएं बना रही है, बच्ची से नज़र मिलाने पर वह उसके गले के पास तेज़ी से ऐसी रेखाएं बनाने लगती। इतना ही नहीं कभी उसे अपने आस-पास बच्चे खेलते प्रतीत होते तो कभी एक विकृत चेहरे वाली बुढ़िया उसे घूरती। 

फैक्टरी से छुट्टी मिलने पर कुछ दिनों के लिए नील अपने गाँव रोशक गया। एक दिन गर्मी से परेशान होकर वह मकान की छत पर सो गया। 

थोड़ी देर बाद उसकी नींद खुली और उसने खुद को स्लीप पैरालिसिस की स्थिति में पाया। तभी उसे जानी-पहचानी बच्चों की आवाज़ें आने लगीं। उसने आँखें घुमायी तो कुछ बच्चों को आकृतियाँ खेलती दिखीं। पूर्णिमा की रात में एक-दो दिन थे इसलिए नील को चांद की रोशनी में उन बच्चों की परछाई तक दिख रही थी। बच्चों को जैसे ही लगा की नील की आँखें उनकी तरफ हैं वो चिल्लाते हुए उसकी तरफ दौड़े, डर के मारे-पसीने से  लथपथ नील कुछ हिला और बच्चे गायब हो गए। थकान के कारण नील को बहुत तेज़ नींद आ रही थी इसलिए वह फिर सो गया। कुछ समय बाद नींद टूटने पर उसे अपनी गर्दन पर वही जाना-पहचाना कटे चेहरे वाली नन्ही बच्ची का स्पर्श महसूस हुआ। "यह क्या हो रहा है? ऐसा पहले तो नहीं हुआ कभी!" उसने सोचा। 

पहले एक रात में या तो बच्चे या यह बच्ची या विकृत बुढ़िया आती थी पर एक रात में इनमे से 2 कभी नहीं आए। बच्ची अपने रूटीन को अपनाते हुए नील की छाती पर रेखाएं बनाने में लगी थी। न चाहते हुए भी नील की नज़रें बच्ची से मिलीं और गुस्से में वह भूतहा बच्ची नील की गर्दन पर कलाकारी करने लगी। नील ने पूरा ज़ोर लगाकर एक झटके में अपना सर हिलाया, उसकी हरकत से वह बच्ची अपने-आप गायब हो गई और पास रखे ईंटों के ढेर से उसका सिर इतनी तेज़ी से लड़ा कि वह बेहोश हो गया। यह भी पहली बार हुआ था कि नील के शरीर ने स्लीप पैरालिसिस की अवस्था मे कुछ हरकत की थी नहीं तो हमेशा ही उसे कई मिनट तक यह डर झेलना पड़ता था। 

जब बेहोशी से उसे होश आया तो एक बार फिर नील स्लीप पैरालिसिस में जड़ था। उसके दिमाग ने कहा अब बुढ़िया की बारी है। 

"बेटे! ले खा लें आम!"

नील का खून ठंडा पड़ गया, लो आज बुढ़िया बोलने भी लगी। 

"गोलू आम खा..."

बुढ़िया उसकी तरफ आम लेकर बढ़ने लगी, जो अंदर से किसी मानव अंग जैसा लग रहा था। पूर्णिमा सी रोशनी में बुढ़िया का चेहरा और भयावह दिख रहा था जिसमे कीड़े-मकोड़े कुलमुला रहे थे। नील को लगा कि इस बार वह हिलेगा तो फिर ये बला भी गायब हो जायेगी। 

"बेटा आम खा ले...इतने प्यार से खिला रही हूँ। सुनता क्यूँ नहीं तू?"

नील ने पूरी शक्ति जुटाकर करवट ली पर उसे अपनी स्थिति का पता नहीं था कि धीरे-धीरे वह खिसक कर छत के कोने में जा चुका है और वो अपने कच्चे मकान की छत से नीचे आ गिरा। छत से गिरने के कारण नील  की कई हड्डियां टूटी और उसके सिर में चोट आने की वजह से उसको लकवा मार गया। अब सिर्फ उसे दिखने वाले बच्चों का झुंड, चेहरा-कटी बच्ची और बुढ़िया नील को हरदम परेशान करते हैं और वह कुछ नहीं कर पाता। हाँ, अब भी वह उनमे से किसी से भी आँखें मिलाने से बचता है। 

समाप्त!

- मोहित शर्मा जहन

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Wednesday, June 29, 2016

"डगमगाहट के लिए खेद है!" (कहानी) #mohit_trendster

वैसे तो जय अकेले काम करने में विश्वास करता था पर चाय की गुमटी से पर उसे एक नया बंदा मिला था साथ काम करने के लिए। शैंकी नामक उस किशोर में जय को अपना 5-7 साल पहले वाला रूप दिखता था जब उसने चोरी-चकारी शुरू की थी। इन वर्षो में अपनी लगन और जीतोड़-शरीर फोड़ मेहनत के चलते उसने काफी जल्दी ठगी के कई पैंतरे सीख लिए थे। अब वो कुछ बड़ा करना चाहता था ताकि जीवन में लंबे समय के लिए आर्थिक स्थिरता आ जाए। शैंकी के रूप में उसे एक लगनशील, गुणवान छात्र मिला था जो उसकी ही तत्परता से सब कुछ सीख रहा था। कुछ महीनों के लिटमस प्रयोगों के बाद आखिरकार बड़े जोखिम की घड़ी आयी। कस्बे के सबसे धनी सुनार-लाला रूपचंद के घर डकैती डालने का जय का बचपन का सपना आज पूरा होने जा रहा था। करोड़ों की बाज़ी थी और शैंकी के साथ जय ने हफ्तों इसकी ड्रिल की थी। संयुक्त परिवार वाले लाला रूपचंद के घर में आज एक गार्ड के अलावा 2 ही लोग थे, लाला और उनकी लाली। 

अंधेरे का फायदा उठाकर शैंकी ने गार्ड को क्लोरोफॉर्म सुंघा कर बेहोश किया और कुछ ही सेकंड के अंदर सोते लाली-लाली को भी डिफ्यूज कर दिया। जय हक्का-बक्का रह गया। 

जय - "तुझे तो लगता है ज़्यादा सीखा दिया यार...आज मुझे आना ही नहीं चाहिए था। अकेला तू ही बहुत था!"

शैंकी - "अरे नहीं भईया! आपसे ही सब सीखा है। आपको इम्प्रेस करने के लिए सब जल्दी निपटा दिया।"

फिर शैंकी और जय घर से पैसे और गहने बटोरने लगे। जय को बड़ा अजीब लग रहा था, सब इतनी आसानी से हो रहा है, कोई अड़चन-हड़बड़ी नहीं। तब उसका ध्यान लाला-लाली पर गया जो सांस नहीं ले रहे थे। उसकी हल्की चीख निकली - "अरे मर गए क्या ये दोनों?" शैंकी ने दोनों की नब्ज़ देखी, दोनों मर चुके थे। जय ने गार्ड को देखा तो उसकी आँखें भी उलट गई थीं। जय गुस्से में बोला - "पागल! इतनी जल्दी क्या थी कि मार ही दिया इन्हे? इतनी बार प्रैक्टिस कराई थी तुझे! डकैती में तो एक बार बच भी जाएं पर ट्रिपल मर्डर में तो पूरे जिले की पुलिस पीछे पड़ जाएगी। साले! डोज़ चेक नहीं की थी क्या रूमालों में लगाते समय?" जय सिर पकड़ कर बैठ गया। 

सहमा हुआ शैंकी बोला - "लगता है बस एक ही रुमाल में सही डोज़ थी।"

जय - "अब क्या फायदा उल्लू के पट्ठे...तीनो मर गए"

शैंकी ने झटके से जय को रुमाल सुंघाया। 

शैंकी - "फायदा है भैया! उन 3 रूमालों में मौत वाली डोज़ थी और आपके वाले चौथे रुमाल में सिर्फ बेहोशी वाली डोज़ है।"

जय की बोझिल होती आँखों के सामने शैंकी उसके पैर छूकर सारा माल लेके चंपत हो गया। कुछ देर बाद लाला के परिवार के कुछ सदस्य घर पर आए और उन्होंने पुलिस के आने तक गुस्से में जय को मार-मार कर, मार-मार कर...मार ही डाला।

समाप्त!

मोहित शर्मा ज़हन 

Artwork - Jorgina Sweeney (Jorgi girl)

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